फागुन
फागुन की रीत चली
मन में है प्रीत पली
होली में कान्हा संग
खेल रही गोपियाँ।।१
गाल हुए लाल
श्याम मले गुलाल
भर पिचकारी रंग
डाल रहीं गोपियाँ ।।२
मन में उमंग लिए
होली की तरंग लिए
हाथों में हाथ लिए
प्रेम दर्शा रही गोपियाँ ।।३
अबीर से रंगा हुआ
मुखड़ा सुवास हुआ
पलाश के रंग से
चहक रहीं गोपियाँ ।।४
धरती डूबी मस्ती में है
हर चेहरा खुशरंग है
होश में है कोई नहीं
फागुन रंग रंगी गोपियाँ ।।५
रंगो में सब रंग
देखो मिल गए हैं
एकता में बंधने का
सपना दिखा रही गोपियाँ ।।६
अनिता मंदिलवार सपना
अंबिकापुर सरगुजा छतीसगढ़
