कलम की सुगंध छंदशाला
उल्लाला शतकवीर सृजन
51. चाकर
उनको चाकर समझे नहीं, मानव सब सम है जहाँ ।
बहता सबमें शोणित वही, रहिए सबसे मिल यहाँ ।।
52. भरती
भरती गागर तम की जहाँ, छाता अंधेरा वहाँ ।
जीवन में आये जब किरन, रुकता अंधेरा कहाँ ।।
53 जगती
जगती रहती आँखें यहाँ, सोता जब संसार है ।
पलकों में सपने बंद है, वीणा की झंकार है ।।
54 बचपन
बचपन की हैं यादें वही, माता रहती हो जहाँ ।
भाई बहना के संग ही, सपने बसते हो वहाँ ।।
55 झरना
झरना जो झरते हो यहाँ, पुलकित मन होता वहाँ ।
बचपन मन का खोता रहा, पानी का सोता जहाँ ।।
56 वाणी
अपनी वाणी मीठी रखो, जैसे झरने झरते यहाँ ।
देता सूरज गरमी हमें, दीपक हो जलता वहाँ ।।
57 पानी
पानी का होता मोल है, समझे कुछ ही लोग हैं ।
बहता रहता है जल यहाँ, करते बस वो भोग हैं ।।
58 माया
माता की माया सम यहाँ, करती सबसे नेह है ।
विनती करती सबके लिए, करती ममता मेह है ।।
59. ज्वाला
ज्वाला दीपक की बढ़ कहे, सहता है जो ताप को ।
साथी बनना सच का यहाँ, हटने दो अब पाप को ।।
60.पनपे
पनपे क्यों देखो रोग है, सोचे समझे अब सभी ।
हाथों को धोते सब रहो, दूरी को अपना अभी ।।
*अनिता मंदिलवार "सपना"*
