अनिता मंदिलवार मंदिलवार, व्याख्याता साहित्यकार, अंबिकापुर सरगुजा छत्तीसगढ़ से

Wednesday, 14 April 2021

उल्लाला छंद- अनिता मंदिलवार "सपना"


 कलम की सुगंध छंदशाला 

उल्लाला शतकवीर सृजन 


51. चाकर


उनको चाकर समझे नहीं, मानव सब सम है जहाँ ।

बहता सबमें शोणित वही, रहिए सबसे मिल यहाँ ।।


52. भरती


भरती गागर तम की जहाँ, छाता अंधेरा वहाँ ।

जीवन में आये जब किरन, रुकता अंधेरा कहाँ ।।


53 जगती


जगती रहती आँखें यहाँ, सोता जब संसार है ।

पलकों में सपने बंद है, वीणा की झंकार है ।।


54 बचपन

बचपन की हैं यादें वही, माता रहती हो जहाँ ।

भाई बहना के संग ही, सपने बसते हो वहाँ ।।


55 झरना


झरना जो झरते हो यहाँ, पुलकित मन होता वहाँ ।

बचपन मन का खोता रहा, पानी का सोता जहाँ ।।


56 वाणी


अपनी वाणी मीठी रखो, जैसे झरने झरते यहाँ ।

देता सूरज गरमी हमें, दीपक हो जलता वहाँ ।।


57 पानी


पानी का होता मोल है, समझे कुछ ही लोग हैं ।

बहता रहता है जल यहाँ, करते बस वो भोग हैं ।।


58 माया


माता की माया सम यहाँ, करती सबसे नेह है ।

विनती करती सबके लिए, करती ममता मेह है ।।


59. ज्वाला 


ज्वाला दीपक की बढ़ कहे, सहता है जो ताप को ।

साथी बनना सच का यहाँ, हटने दो अब पाप को ।।


60.पनपे


पनपे क्यों देखो रोग है, सोचे समझे अब सभी ।

हाथों को धोते सब रहो, दूरी को अपना अभी ।।


 *अनिता मंदिलवार "सपना"*

No comments:

Post a Comment

रेडियो श्रोता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ

 संस्मरण  रेडियो श्रोता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ  रेडियो और मैं बचपन से रेडियो सुनने का शौक था मुझे । बचपन में रेडियो सुनते सुनते सो...