अंबिकापुर सरगुजा छतीसगढ़ से साहित्यकार, व्याख्याता जीवविज्ञान, समाजसेवा के लिए तत्पर अनिता मंदिलवार 'सपना', हिन्दी साहित्य और अंग्रेजी साहित्य में स्नात्तकोतर, पीजीडीसीए, बी• एड•, आकाशवाणी से वाणी सर्टिफिकेट प्राप्त । आकाशवाणी अंबिकापुर में विगत बाईस वर्षों से महिलाओं के कार्यक्रम घर आँगन कार्यक्रम में कम्पीयरिंग, तीस रेडियो नाटक, बीस रेडियो रूपक लेखन, कहानियों, कविताओं का प्रसारण आकाशवाणी और दूरदर्शन से ।
अनिता मंदिलवार मंदिलवार, व्याख्याता साहित्यकार, अंबिकापुर सरगुजा छत्तीसगढ़ से
Tuesday, 25 May 2021
Friday, 21 May 2021
एक कप चाय और तुम- अनिता मंदिलवार "सपना"
आज चाय दिवस पर
एक कप चाय और तुम
जब एक कप चाय
के साथ
बालकनी में बैठती हूँ
सामने पेड़ो पर
चिड़िया चहकती
दिखाई देती है
सावन माह में
रिमझिम बरसात की बूँदें
सुंदर संगीत का
आभास कराती है
और तुम्हारी याद
अनायास ही
मन मस्तिष्क में
चली आती है
तुम नहीं होकर भी
पास होते हो
एक कप चाय के साथ
और अपनी प्यारी सी
आवाज के साथ
जब कहते हो
सपना, कहीं तुम
सचमुच सपना तो नहीं
चाय का स्वाद
बढ़ जाता है
और मुस्कान होठों पर
बरबस चली आती है •••!
अनिता मंदिलवार सपना
अंबिकापुर सरगुजा छतीसगढ़
Thursday, 20 May 2021
आज कुछ नया करना है- अनिता मंदिलवार सपना
शुभ प्रभात आप सभी को
नयी रचना के साथ
*आज कुछ नया करना है*
आज कुछ
नया करना है
देखो
उन सफेद फूलों से
उड़ते सेमल को
मुट्ठी में कैद करना है
अंजुलि में
भरने की इच्छा
बहुत मुश्किल है
जब हवा भी
प्रतिरोध करें !
आज कुछ
नया करना है
उड़ती पतंग की गति
और मन की उड़ान
दोनों की समानता
आसमान को छूना
बहुत मुश्किल
पूरे हो अरमान
जब अपने ही
विरोध करें !
आज कुछ
नया करना है
उड़ती चिड़िया
कितनी मगन
तिनके तिनके से
बना घोसला
नहीं जानती
आगे क्या हो
किसी ने उजाड़ दिया
बहुत मुश्किल है
समझना
कभी तो
मानव बोध करें !
अब कुछ
नया करना है
नदियों का
कम होता जल
कंक्रीट का शहर
बने थल
कोई न जाने
यहाँ होगा क्या कल
बहुत मुश्किल है
समझना
जब प्रकृति शोध करें
जब प्रकृति प्रतिशोध करें !
*अनिता मंदिलवार "सपना"*
Wednesday, 19 May 2021
कदम बढ़ाना ही होगा
कदम बढ़ाना ही होगा
चाहती हूँ
बहुत दूर
चली जाऊँ
आवाज देने
पर भी
लौट न पाऊँ
अब इत्मीनान है
अकेला कोई नहीं
सब हैं साथ
अब आराम की
दरकार है
चिरनिद्रा
बुलाती है हमें
कदम
बढ़ाना ही होगा
वादे निभाये कम
टूटते ज्यादा हैं
जीवन
बना न अपना
रह गया
कोई सपना
दिल और दिमाग
चल पड़े हैं
अलग राहों पर
इस अन्तर्द्वन्द्व का
अंजाम क्या होगा
ईश्वर ही जाने
सब खेल उसी का
हम एक पात्र मात्र
निभाते किरदार
अपना
मंच पर यहाँ
जिसकी डोर
प्रभु के हाथ है !
अनिता मंदिलवार "सपना"
सपनों का आबंध नहीँ- अनिता मंदिलवार सपना
रेडियो श्रोता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ
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