संस्मरण
रेडियो श्रोता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ
रेडियो और मैं
बचपन से रेडियो सुनने का शौक था मुझे । बचपन में रेडियो सुनते सुनते सो जाती थी मैं । बिस्तर से मेरी माँ रेडियो को बंद करके मेज पर रखती थी । ये प्रतिदिन का नियम सा था । रेडियो सुनने का जुनून इस कदर हावी था कि टेलीविजन आने के बाद भी मैं रेडियो सुनती थी । आपको जानकर आश्चर्य होगा कि पढ़ाई के वक्त भी धीमी आवाज में हमारा रेडियो बजता रहता । रेडियो से लगाव ने लेखन में रूचि पैदा की । और समाचार पत्र भी पढ़ने का उतना ही शौक रहा ।
रेडियो से जुड़ाव ने हमें आकाशवाणी से जोड़ा ।
आकाशवाणी से जुड़ना मेरे लेखन में निखार को गति दी । रेडियो से मुझे मेरी पहचान मिली । साहित्य अभिरुचि पहले से रही मुझमें । गद्य और पद्य दोनों जिसमें बहुत सारे रेडियो नाटक और रूपक भी शामिल है । महिलाओं का कार्यक्रम घर आँगन कार्यक्रम की प्रस्तुत कर्ता के रूप में लगभग बाईस सालों से सजीव प्रस्तुति दे रही हूँ । आज भी रेडियो उतना ही महत्वपूर्ण है मेरे लिए ।
शादी के बाद ससुराल भी अपना रेडियो लेकर आई । मेरे रेडियो के प्रति लगाव देखकर मेरे पतिदेव ने मेरे लिए नया रेडियो लाकर दिया ।
ये जन्म दिन का सबसे अनमोल उपहार मेरे लिए आज तक में से है । वो रेडियो मेरे पास है ।
खास है मेरे लिए रेडियो और रेडियो से जुड़े सभी लोग ।
अनिता मंदिलवार "सपना"


