पराजित सत्य
कौन कहता है
सत्य कभी
पराजित नहीं होता
आज के इस युग में
सब संभव है
दिखावे की
चकाचौंध
प्रसिद्धि की चाहत
जब किसी को
अंधा बना दे
तो वह अर्श को
फर्श में झुकाने को
तत्पर हो जाता है
जी हाँ,
इंसान की बात
कर रहीं हूँ मैं
जो इंसान होने का
दंभ भरते तो जरूर हैं
पर इंसानियत
तृण मात्र भी
नहीं होती
इनके अंदर
आज पैसे से सब
खरीदा जा सकता है
प्रेम, स्नेह, दोस्ती,
ज्ञान, ममत्व,
दुलार, खुशी
आज सभी भावनाएँ
बिकती सी
दिखती है
सच की
कीमत शून्य
सपना इस
चकाचौंध से दूर
ऐसे युग को
जीना चाहती है
जहाँ सत्य की
पूजा की जाती है
कलयुग में
सतयुग की चाह
है तो कठिन
पर खोज जारी है
अविराम------!
अनिता मंदिलवार "सपना"

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