नवगीत
भरे पलक स्नेह समर्पण
आकर मुझे रिझाते हैं ।
प्रेम भरे अभिनंदन पर
नेह भरा उत्सव समर्पण
रोम रोम श्वास समर्पित
प्रीत रंगा गीत अर्पण
नेह पगी देह गंध से
मन को ये महकाते हैं ।
ह्रदय बजते नेह वंशी
भरे जागृति प्रलय पुंज
भूली यादें नयी हुई
जीवन राग किसलय कुंज
सपने बुनते प्रणय रंग
अनुपम रस छलकाते हैं ।
चिड़िया पंखों से झलती
बन टहनी बाँहे झूली
आँधी भावुक हो मचली
हवा में पंथ वह भूली
खिली धूप में चिट्ठियों के
खूब संदेशे आते हैं ।
भरे पलक••••
आकर••••••
अनिता मंदिलवार सपना

वाह्ह्ह्ह्ह उत्कृष्ट शानदार
ReplyDeleteबेहतरीन प्रस्तुति
सादर प्रणाम आपको
जय राधे राधे श्याम कृष्णा