अनिता मंदिलवार मंदिलवार, व्याख्याता साहित्यकार, अंबिकापुर सरगुजा छत्तीसगढ़ से

Thursday, 20 January 2022

आईना हूँ


 नई प्रस्तुति ......


हाथ बढ़ाओ जरा और सँभाल लो हमें ।

गमों के दौर से बाहर निकाल लो हमें ।।

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जिन्दगी यूँ ही तमाम बीत जायेगी यहाँ ।

ऑखों में अपने ख्वाब सा पाल लो हमें ।।

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वक्त की गर्दिश में गुम हो न जायें कहीं ।

वक्त रहते ही थोड़ा सा खंगाल लो हमें ।।

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यूँ दूर रहकर हमसे दूरियाॅ न बढ़ाओ ।

पास आकर तुम जरा देखभाल लो हमें ।।

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कोई पत्थर के जैसा न समझो मुझको ।

नगीना समझ हाथों में डाल लो हमें ।।

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देखो यहाँ रहे न कोई 'सपना' अधूरा ।

आईना हूँ देखकर जरा सँवार लो हमें ।।


......... ..................सपना

Thursday, 6 January 2022

हम

 


हम

मैं
और तुम
अब हैं हम
हम शब्द
एहसास दिलाता है
दो व्यक्तियों के लिए
समाज, परिवार
और देश के लिए
आज देश को
जरूरत है हम बनें
हम कोशिश करें
मैं रहकर हम बनने की
साथ होकर
एक हुए हमेशा
कामयाब हुए
क्योंकि
एकता में शक्ति होती है
ऐसा पढा, देखा,सीखा हमनें
तो आइए आज हम
साथ न होकर भी
साथ निभायें अपनों के
देश के प्रति
अपनी जिम्मेदारी निभायें
यही तो प्रेम है
देश प्रेम
जिसने हमें सब दिया है
अब हमारी बारी है ।

अनिता मंदिलवार सपना


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