सपनों का आबंध नहीं
कोई छंद नहीं
अनुबंध नहीं
सपनो का अब
आबंध नहीं
अब रहना है
स्वतंत्र हमें
जीना है बस
अपने ही लिए
दूसरों के लिए
जी कर देख लिए
मिलता है केवल
संताप यहाँ
किसी सोच में अब
बंधना नहीं
माया से अब
अपना संबंध नहीं
मेरी सोच सबके लिए
अच्छा है
अब बात यही
बस सच्चा है
जो जान न पाये
सच्चाई
फिर क्या बचा है
अच्छाई
जीवन का कोई
आकार न हो
सपना कोई
साकार न हो
सपनों की दुनिया
छोड़ चले
अब बस जीना
अपने ही लिए !
अनिता मंदिलवार

बहुत सुंदर व सार्थक रचना
ReplyDeleteआभार आपका
Deleteवाह दीदी वाह कोई छंद नहीं अनुबंध नहीं
ReplyDeleteआभार आपका
Deleteबहुत सुंदर भाव नमन आपके लेखन को
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