🌹*भरोसा* 🌹
भरोसा जब किया हमने,
लगा उसे भ्रम है ।
चक्षु बंद हैं उसके,
और अपनी नम है ।।
जग को दिया है उजाला,
मेरे हिस्से क्यूँ तम हैं ।
कर्म करती रही सपना,
लगे हर बार कम है ।।
*अनिता मंदिलवार "सपना"*
अंबिकापुर सरगुजा छतीसगढ़ से साहित्यकार, व्याख्याता जीवविज्ञान, समाजसेवा के लिए तत्पर अनिता मंदिलवार 'सपना', हिन्दी साहित्य और अंग्रेजी साहित्य में स्नात्तकोतर, पीजीडीसीए, बी• एड•, आकाशवाणी से वाणी सर्टिफिकेट प्राप्त । आकाशवाणी अंबिकापुर में विगत बाईस वर्षों से महिलाओं के कार्यक्रम घर आँगन कार्यक्रम में कम्पीयरिंग, तीस रेडियो नाटक, बीस रेडियो रूपक लेखन, कहानियों, कविताओं का प्रसारण आकाशवाणी और दूरदर्शन से ।
भरोसा जब किया हमने,
लगा उसे भ्रम है ।
चक्षु बंद हैं उसके,
और अपनी नम है ।।
जग को दिया है उजाला,
मेरे हिस्से क्यूँ तम हैं ।
कर्म करती रही सपना,
लगे हर बार कम है ।।
*अनिता मंदिलवार "सपना"*
नवगीत
भरे पलक स्नेह समर्पण
आकर मुझे रिझाते हैं ।
प्रेम भरे अभिनंदन पर
नेह भरा उत्सव समर्पण
रोम रोम श्वास समर्पित
प्रीत रंगा गीत अर्पण
नेह पगी देह गंध से
मन को ये महकाते हैं ।
ह्रदय बजते नेह वंशी
भरे जागृति प्रलय पुंज
भूली यादें नयी हुई
जीवन राग किसलय कुंज
सपने बुनते प्रणय रंग
अनुपम रस छलकाते हैं ।
चिड़िया पंखों से झलती
बन टहनी बाँहे झूली
आँधी भावुक हो मचली
हवा में पंथ वह भूली
खिली धूप में चिट्ठियों के
खूब संदेशे आते हैं ।
भरे पलक••••
आकर••••••
अनिता मंदिलवार सपना
बहनें
बहनें कैसी होती हैं ।
बहनें ऐसी होती हैं ।।
बहनें होती हैं पुनीता
नाम है जिनका सुनीता
निराशा के भंवर में भी
आशा बनती है अनीता
बहनें ऊर्जा का संचार
परिवार का आधार
आपस का देखो प्यार
मिश्रण ममता और दुलार
उनकी आपस की बातें
बीते सारी सारी रातें
यादों का खुले पिटारा
जब सब संग रह पातें
दूर रहे या पास रहे
ह्रदय में आभास रहे
मन से दूर कभी नहीं
सपना सायास रहे
अनिता मंदिलवार "सपना"
चक्रव्यूह
चक्रव्यूह रचते हैं देखो तो
छुप छुप कर लोग यहाँ ।
अर्जुन बनना है अब तो
चक्रव्यूह तोड़ना है सारे ।।
अनिता मंदिलवार "सपना"
*मैं कौन हूँ*
आज फिर से अंदर से
एक आवाज आई
मैं कौन हूँ?
कहते हैं नारी की
पहली जिम्मेदारी
घर, परिवार, बच्चे
अपने आप को तोड़कर
पूरी करती रही जिम्मेदारी
फिर भी नारी क्यों हारी !
क्या उसका कसूर
बस इतना था
वह जीना चाहती थी
कुछ पल अपने लिए
उड़ना चाहती थी
उन्मुक्त गगन में
उसकी क्या गलती थी
अपनी क्षमताओं का
उपयोग ही तो करना
चाहती थी
गढ़ना चाहती थी
एक नया इतिहास !
दूसरों की छोड़ो
अपनों ने भी
साथ नहीं दिया
बस आज भी
नारी की परिभाषा
इतनी सी है
वह औरों के लिए जिए
हाँ, बस औरों के लिए
*अनिता मंदिलवार "सपना"*
*सपनों का मोल*
एक लड़की
जो प्रेम पाना चाहती थी
प्रेम के बदले
समर्पण चाहती थी
समर्पण के बदले
क्या उसकी चाह
गलत थी ?
सभी ने उसे
अपने हिसाब से
उसका उपयोग
करना चाहा
क्या घर
और क्या बाहर
प्रेम न उसे मिलना था
न ही मिल पाया !
उसकी चाहत का क्या
उसके सपनों का क्या
कोई मोल था या है ?
शायद नहीं
उसकी चाहत ही
गलत है
उसे कुछ पाने का
हक नहीं है
हाँ, नहीं है -----!
*अनिता मंदिलवार "सपना"*
संस्मरण रेडियो श्रोता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ रेडियो और मैं बचपन से रेडियो सुनने का शौक था मुझे । बचपन में रेडियो सुनते सुनते सो...